मोबाइल: सुविधा या दुविधा? एक ही कमरे में पास होकर भी दूर हो रहा परिवार -लेखक: अमित्रघात-Newsnetra
मोबाइल: सुविधा या दुविधा
( पारिवारिक परिदृश्य में)
आज के आधुनिक युग में मोबाइल फोन हमारे जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। सुबह उठने के अलार्म से लेकर रात को सोने से पहले तक, यह उपकरण हर पल हमारे हाथ में रहता है। शादी,जन्मदिन,पार्टी और किसी की मृत्यु पर भी यह नहीं छूटता.
ऐसे में यह सोचना जरूरी हो गया है कि सामाजिक और पारिवारिक परिदृश्य में मोबाइल हमारे लिए एक वरदान (सुविधा) है या एक अभिशाप (दुविधा)।
इसमें कोई शक नहीं है कि मोबाइल ने दुनिया को बहुत छोटा और आसान बना दिया है.
सामाजिक दूरी:-
लोग एक ही कमरे में बैठकर भी आपस में बात करने के बजाय मोबाइल में खोए रहते हैं। इससे वास्तविक रिश्ते कमजोर हो रहे हैं।
मोबाइल और पारिवारिक रिश्ते इस कदर जुड़े हुए हैं कि बहरहाल मोबाइल की वजह से रिश्तों में कड़वाहट एवं अकेलापन महसूस हो रहा है. सभी पारिवारिक रिश्तों के होते हुए भी एक ही कमरे में सब लोग संवाद को छोड़कर अपना मोबाइल लेकर बैठ जाते हैं.
बढ़ती दूरियां-
आज के दौर में मोबाइल ने हमारे पारिवारिक और सामाजिक जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है
पास होकर भी दूर:-
आज एक ही घर और एक ही कमरे में बैठे होने के बावजूद परिवार के सदस्य आपस में बात नहीं करते। हर कोई अपनी मोबाइल स्क्रीन में खोया रहता है।
संवाद की कमी:- पहले रात को भोजन के समय पूरा परिवार दिनभर की बातें साझा करता था, लेकिन अब डाइनिंग टेबल पर भी लोग फोन स्क्रॉल करते नजर आते हैं। इससे आपसी बातचीत (कम्युनिकेशन गैप) कम होती जा रही है।
अकेलापन और चिड़चिड़ापन:-
वर्चुअल दुनिया (फेसबुक, इंस्टाग्राम) के दोस्तों को समय देने के चक्कर में लोग अपने माता-पिता, जीवनसाथी और बच्चों की उपेक्षा कर देते हैं। जब कोई उन्हें टोकता है, तो वे चिड़चिड़े हो जाते हैं।
त्योहारों का बदलता रूप:-
अब त्योहारों और शादियों में लोग अपनों से मिलने और खुशियां बांटने से ज्यादा, तस्वीरें खींचने और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट करने में व्यस्त रहते हैं।
निष्कर्ष:-
मोबाइल फोन अपने आप में न तो अच्छा है और न ही बुरा। यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसका उपयोग कैसे करते हैं। यदि हम इसका उपयोग एक साधन के रूप में अपनी प्रगति के लिए करते हैं, तो यह एक बेहतरीन सुविधा है। लेकिन अगर हम इसके गुलाम बन जाते हैं और इसे अपने परिवार और रिश्तों से ऊपर रख देते हैं, तो यह निश्चित रूप से एक बड़ी दुविधा बन जाता है। समझदारी इसी में है कि हम पारिवारिक सदस्यों से संवाद करते वक्त मोबाइल को एक तरफ रख दें. सोशल मीडिया के टाइम को थोड़ा-थोड़ा करके कम करने की कोशिश करें.
हम घर पर ‘नो-मोबाइल ज़ोन’ या ‘स्क्रीन-फ्री टाइम’ तय करें, ताकि अपनों को उनका हक का समय मिल सके। क्योंकि सच्चे रिश्ते ही परिवार को जोड़ सकते हैं और सच्चे रिश्ते तब बनेंगे जब आप उनको समय देंगे.

लेखक
अमित्रघात.





