युवाओं को भाषण नहीं, रोजगार और सम्मान चाहिए”: ‘मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन’ पर गरिमा मेहरा दसौनी ने सरकार से पूछे तीखे सवाल-Newsnetra
मुख्यमंत्री जी बताएं—जिस युवा पर रोजगार मांगने पर लाठियां बरसीं, क्या वह ‘युवा मंथन’ में अपना दर्द भूल जाएगा?
उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा प्रदेश के लाखों छात्र-छात्राओं से संवाद और ‘मुख्यमंत्री युवा विद्यार्थी मंथन’ कार्यक्रम शुरू किए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री जी को आज अचानक Gen-Z की याद आ गई, लेकिन सवाल यह है कि युवाओं से संवाद अच्छी बात है, लेकिन संवाद तभी सार्थक होता है जब सरकार युवाओं की आवाज सड़क पर भी सुने और सचिवालय में भी।

उन्होंने कहा
आज सरकार युवाओं से सपनों के उत्तराखंड पर निबंध लिखवा रही हैं, लेकिन क्या आपको वह युवा याद है जो रोजगार को अपना अधिकार बताते हुए देहरादून के घंटाघर पर सड़कों पर उतरा था?
वर्ष 2023 में भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और CBI जांच की मांग को लेकर हजारों बेरोजगार युवा देहरादून में आंदोलन कर रहे थे। उस दौरान पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारियां और गंभीर धाराओं में मुकदमों का मामला सामने आया था।
क्या उन युवाओं के जख्म सिर्फ इसलिए भर गए क्योंकि आज मुख्यमंत्री उनके साथ संवाद कर रहे हैं?
दसौनी ने पूछा कि यदि सरकार वास्तव में Gen-Z के मिजाज को समझ चुकी है तो फिर युवा जब रोजगार, पारदर्शी भर्ती और अपने अधिकारों की मांग लेकर सामने आता है, तब उसके साथ संवाद क्यों नहीं, बल्कि पुलिस क्यों खड़ी दिखाई देती है?
मुख्यमंत्री जी, कुछ सवालों के जवाब भी दीजिए—
- क्या केवल ऑनलाइन संवाद से गांव का युवा भी जुड़ पाएगा?
उत्तराखंड के दूरस्थ पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में क्या हर छात्र के पास स्मार्टफोन, पर्याप्त इंटरनेट डेटा और स्थिर नेटवर्क उपलब्ध है? क्या सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि सीमांत और दूरस्थ क्षेत्रों का कोई बच्चा डिजिटल सुविधा के अभाव में इस कार्यक्रम से बाहर न रह जाए?
सरकार स्वयं डिजिटल और वर्चुअल शिक्षा के विस्तार की बात कर रही है—ऐसे में डिजिटल डिवाइड की वास्तविक स्थिति पर भी सरकार को सार्वजनिक आंकड़े देने चाहिए। राज्य में 500 स्कूलों में स्मार्ट क्लास संचालित होने और करीब 1,500 स्कूलों को वर्चुअल क्लास नेटवर्क से जोड़ने की योजनाओं की बात सरकार की ओर से कही गई है।
- राहुल गांधी को ‘पप्पू’ कहकर मजाक उड़ाने वाले आज उसी शैली की राजनीति का अनुसरण क्यों कर रहे हैं?
दसौनी ने कहा कि राहुल गांधी लंबे समय से युवाओं, छात्रों, बेरोजगारों और आम नागरिकों के साथ सीधे संवाद की राजनीति करते रहे हैं। आज जब सियासी जमीन खिसकती दिखाई दे रही है तो उसी संवाद की शैली अपनाने की कोशिश क्यों? - छात्रों के मासूम कंधों पर ‘विकसित उत्तराखंड’ बनाने की जिम्मेदारी क्यों?
दसौनी ने पूछा कि प्रदेश में भारी-भरकम वेतन पाने वाला प्रशासनिक तंत्र है, विशेषज्ञ अधिकारी हैं और भाजपा की प्रचंड बहुमत वाली सरकार है। फिर विकसित उत्तराखंड की नीति बनाने की जिम्मेदारी नीतिगत विफलताओं से जूझ रही सरकार बच्चों से निबंध लिखवाकर क्यों पूरी करना चाहती है?
बच्चे सपने जरूर देखें, लेकिन सरकार का काम उन सपनों को निबंध की कॉपी में नहीं, नीति और जमीन पर साकार करना है।
- छात्रों का निजी डेटा कौन सुरक्षित रखेगा?
दसौनी ने कहा कि सरकार बच्चों से ऑनलाइन फॉर्म भरवा रही है। ऐसे में सरकार स्पष्ट करे कि इस फॉर्म के माध्यम से छात्रों से कौन-कौन सी निजी जानकारियां ली जाएंगी, उनका डेटा कहां सुरक्षित रखा जाएगा, कितने समय तक रखा जाएगा और उसका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए होगा?
यदि किसी छात्र की निजी जानकारी का दुरुपयोग हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
उन्होंने कहा कि Gen-Z सिर्फ सोशल मीडिया चलाने वाली पीढ़ी नहीं है। यह Privacy, Data Protection और Accountability समझने वाली पीढ़ी है। इसलिए सरकार को इस पर स्पष्ट Data Protection Policy सार्वजनिक करनी चाहिए।
- पढ़ाई से ज्यादा जरूरी राजनीतिक आयोजन कब से हो गए?
दसौनी ने कहा कि उत्तराखंड के अभिभावक अपना पेट काटकर बच्चों की फीस भरते हैं ताकि उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके।
कभी दिल्ली-देहरादून हाईवे पर बच्चों को धूप में खड़ा करके प्रधानमंत्री का स्वागत कराया जाता है, कभी राजनीतिक कार्यक्रमों के नाम पर उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है, कभी बारिश, कभी कांवड़ यात्रा और कभी अन्य व्यवस्थाओं के कारण स्कूल बंद होते हैं।
अब यदि पढ़ाई के समय बच्चों को सरकारी संवाद और अनिवार्य गतिविधियों में लगाया जाएगा तो अभिभावक पूछेंगे ही कि उनकी फीस और बच्चों के बहुमूल्य शैक्षणिक समय की कीमत कौन चुकाएगा?
- निबंध प्रतियोगिता स्वैच्छिक हो, बच्चों पर थोपी न जाए
दसौनी ने कहा कि ‘मेरे सपनों का उत्तराखंड’ विषय पर निबंध प्रतियोगिता में भाग लेना पूरी तरह स्वैच्छिक होना चाहिए।
सरकार बच्चों को अपने राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाने के बजाय उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने और आलोचनात्मक प्रश्न पूछने का अवसर दे।
अगर किसी बच्चे के सपनों का उत्तराखंड बेरोजगारी मुक्त है, तो क्या वह लिख सकता है?
अगर किसी बच्चे के सपनों का उत्तराखंड भ्रष्टाचार मुक्त है, तो क्या वह लिख सकता है?
अगर किसी बच्चे के सपनों का उत्तराखंड ऐसा है जहां पेपर लीक न हों और युवाओं पर लाठियां न चलें, तो क्या वह बेझिझक लिख सकता है?
यही असली Gen-Z dialogue होगा।
- 1,500 सरकारी स्कूलों के बंद/विलय के सवाल का जवाब कब?
दसौनी ने कहा कि जिस सरकार को आज बच्चों के सपनों का उत्तराखंड जानने की इतनी चिंता है, उसे पहले यह बताना चाहिए कि सरकारी स्कूलों के बंद या विलय की नीतियों ने ग्रामीण और पर्वतीय बच्चों के भविष्य पर क्या असर डाला?
सरकार ने कम नामांकन वाले लगभग 1,500 प्राथमिक विद्यालयों को बंद अथवा आसपास के विद्यालयों में मर्ज करने की योजना पर काम करने की बात कही थी।
पहाड़ के बच्चे का सपना स्कूल तक पहुंचने का है या कई किलोमीटर दूर स्कूल जाने का?
दसौनी ने कहा—
मुख्यमंत्री जी, बच्चों से उनके सपनों का उत्तराखंड लिखवाने से पहले उन्हें ऐसा उत्तराखंड दीजिए जिसमें रोजगार के लिए सड़क पर उतरने पर लाठियां न पड़ें, परीक्षा देने वाला युवा पेपर लीक से न डरे, गांव का बच्चा इंटरनेट के अभाव में पीछे न छूटे और अभिभावक अपने बच्चे की शिक्षा को लेकर चिंतित न हो।
उन्होंने कहा कि पैंट-कमीज और वेस्टकोट पहन लेने से Gen-Z का मिजाज नहीं समझा जा सकता। Gen-Z को फैशन नहीं, फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन, रोजगार, अवसर, पारदर्शिता, समानता, डिजिटल अधिकार और जवाबदेही चाहिए।युवा मुख्यमंत्री का युवाओं के बीच जाना स्वागत योग्य है, लेकिन मुख्यमंत्री जी को यह याद रखना चाहिए कि Gen-Z को केवल संवाद नहीं चाहिएउसे जवाब भी चाहिए।
— गरिमा मेहरा दसौनी
मुख्य प्रवक्ता, उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस





