जापान से बागेश्वर पहुंची पत्नी, सरयू में विसर्जित की पति की अस्थियां; भावुक कर देगी रॉबर्ट की कहानी-Newsnetra
बागेश्वर: भारत में नदियों को केवल जलधारा नहीं, बल्कि आस्था और जीवन का हिस्सा माना जाता है। यही वजह है कि मृत्यु के बाद अस्थियों को पवित्र नदियों में विसर्जित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। अब इसी आस्था और भावनात्मक जुड़ाव की एक अनोखी तस्वीर उत्तराखंड के बागेश्वर से सामने आई है। जापान की एक महिला अपने दिवंगत पति की अंतिम इच्छा पूरी करने हजारों किलोमीटर दूर बागेश्वर पहुंची और सरयू नदी में उनकी अस्थियां विसर्जित कीं।
जापान से बागेश्वर आईं मियाको, सरयू में किया अस्थि विसर्जन
बागेश्वर के सरयू तट पर जापान की मियाको केटलेट अपने दिवंगत पति रॉबर्ट केटलेट की अस्थियां लेकर पहुंचीं। यहां जापानी धर्मगुरु की मौजूदगी में विधि-विधान से पूजा कराई गई। मंत्रोच्चारण के बीच मियाको ने अपने पति की अस्थियों को सरयू की पवित्र धारा में प्रवाहित किया।
यह पल उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वर्षों से संजोई गई अपने पति की आखिरी इच्छा को पूरा करने का भावुक क्षण था।
योग शिविर में हुई थी दोनों की मुलाकात
रॉबर्ट केटलेट मूल रूप से अमेरिका के रहने वाले थे और वहां अंग्रेजी के प्रोफेसर के तौर पर काम करते थे। साल 2005 में एक योग साधना शिविर के दौरान उनकी मुलाकात जापान की मियाको से हुई।
धीरे-धीरे दोनों की पहचान गहरे रिश्ते में बदल गई। उस समय मियाको भी जापान में अंग्रेजी की प्रोफेसर थीं। उन्होंने रॉबर्ट को जापान आने और वहां अंग्रेजी पढ़ाने का प्रस्ताव दिया।
मियाको के आग्रह पर रॉबर्ट 2007 में अमेरिका से जापान चले गए और फिर वहीं बस गए। लेकिन इसी दौरान उत्तराखंड के बागेश्वर से उनका ऐसा जुड़ाव बना, जिसे वह जीवन के अंतिम समय तक नहीं भूल पाए।
2007 में पहली बार पहुंचे थे बागेश्वर
रॉबर्ट अपनी पत्नी मियाको के साथ पहली बार वर्ष 2007 में बागेश्वर आए थे। हिमालयी वातावरण, प्राकृतिक सुंदरता और सरयू नदी ने उन्हें खास तौर पर प्रभावित किया।
बताया जाता है कि इस यात्रा के बाद बागेश्वर उनके दिल के बेहद करीब हो गया। सरयू नदी से उनका जुड़ाव भी लगातार बना रहा।
लंबी बीमारी के बाद वर्ष 2022 में रॉबर्ट का निधन हो गया। निधन से पहले उनकी इच्छा थी कि उनकी अस्थियों को बागेश्वर की सरयू नदी में ही विसर्जित किया जाए।
पति की इस इच्छा को मियाको ने वर्षों तक अपने साथ संजोए रखा और आखिरकार जापान से भारत पहुंचकर उसे पूरा किया।
क्यों खास है बागेश्वर और सरयू?
कुमाऊं का बागेश्वर धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नगर माना जाता है। यह सरयू और गोमती नदियों के संगम पर बसा है और यहां प्रसिद्ध बागनाथ मंदिर स्थित है, जो भगवान शिव को समर्पित है। उत्तराखंड पर्यटन के अनुसार, सरयू-गोमती संगम पर होने वाला उत्तरायणी मेला भी बागेश्वर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बागेश्वर को भगवान शिव की भूमि के रूप में भी जाना जाता है। यहां स्थित बागनाथ मंदिर और सरयू-गोमती संगम देशभर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। यही धार्मिक वातावरण और सरयू की आस्था इस स्थान को विशेष बनाती है।
हरिद्वार ही नहीं, बागेश्वर की सरयू से भी जुड़ रही आस्था
आमतौर पर अस्थि विसर्जन के लिए हरिद्वार जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों का नाम सामने आता है। लेकिन रॉबर्ट केटलेट की कहानी बताती है कि किसी पवित्र नदी से जुड़ी आस्था केवल धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं होती, बल्कि व्यक्तिगत भावनाओं और यादों से भी गहराई से जुड़ सकती है।
रॉबर्ट के लिए बागेश्वर और सरयू केवल एक पर्यटन स्थल या नदी नहीं थे। यह उनके जीवन की एक खास स्मृति से जुड़ा स्थान था। यही वजह है कि उनकी अंतिम इच्छा भी इसी पवित्र धारा से जुड़ी थी।
जापान से हजारों किलोमीटर का सफर तय कर मियाको का बागेश्वर पहुंचना और पति की आखिरी इच्छा पूरी करना भारत की नदी परंपरा और उससे जुड़े भावनात्मक रिश्ते की एक अनोखी मिसाल बन गया है





