बढ़ती जिंदगी, पिछड़ते रिश्ते: कहीं अपनों को पीछे तो नहीं छोड़ रहे हम ?-Newsnetra
बढ़ती जिंदगी, पिछड़ते रिश्ते
जिंदगी लगातार आगे बढ़ रही है…
नई मंजिलें, नई जिम्मेदारियां, नई तकनीक और रिश्तो का रूप.
सब कुछ तेजी से बदल रहा है। लेकिन इसी तेज़ रफ्तार में कहीं कुछ पीछे छूटता जा रहा है। शायद हमारे रिश्ते… शायद अपने लोग… और शायद हम खुद।
एक समय था जब किसी अपने से मिलने के लिए किसी बहाने की जरूरत नहीं होती थी। घर के आंगन में बैठकर घंटों बातें होती थीं। रिश्तेदारों के घर बिना बताए पहुंच जाना भी अपनापन था। किसी की खुशी पूरे परिवार की खुशी होती थी और किसी का दुख सबका दुख।
आज हमारे हाथ में दुनिया से जुड़े रहने के लिए मोबाइल है, लेकिन अपनों के लिए समय नहीं। फोन की स्क्रीन पर सैकड़ों लोगों के संदेश दिखाई देते हैं, मगर जिस इंसान की आवाज सुनने के लिए कभी दिल बेचैन रहता था, उससे बात करने का समय नहीं मिलता।
हम कहते हैं—”समय नहीं है।”
लेकिन सच तो यह है कि समय कम नहीं हुआ, हमारी प्राथमिकताएं बदल गई हैं।
क्योंकि हमारी जिंदगी में पहले भी 24 घंटे थे अभी 24 घंटे ही हैं.
पहले रिश्ते निभाने के लिए लोग समय निकालते थे, आज समय बचने या कुछ काम निकलने पर रिश्ते याद आते हैं।
जिंदगी आगे बढ़ती रही।
बचपन पीछे छूट गया।
दोस्त अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में उलझ गए।
भाई-बहन दूर हो गए।
माता-पिता बूढ़े होते गए।
और हम… अपनी जिंदगी की दौड़ में इतने व्यस्त हो गए कि यह देखना ही भूल गए कि हमारे अपने हमसे कितनी दूर हो चुके हैं।

कभी-कभी सोचता हूं, क्या सच में हम इतने व्यस्त हैं या हमने अपनों को अपनी जिंदगी की सूची में नीचे कर दिया है?
रिश्ते अचानक खत्म नहीं होते।
वे धीरे-धीरे कमजोर पड़ते हैं—एक फोन न करने से, एक मुलाकात टालने से, एक जरूरी बात अनसुनी करने से और कभी-कभी सिर्फ इस अहंकार से कि “पहले वह बात करे।”
शायद रिश्तों को बड़े-बड़े तोहफों की नहीं, थोड़े से समय और सच्चे अपनापन की जरूरत होती है।
मेरी अपनी जिंदगी में भी कुछ रिश्ते ऐसे हैं जिन्हें मैं आज पहले से ज्यादा महसूस करता हूं। कुछ लोग जो कभी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हुआ करते थे, आज सिर्फ यादों में रह गए हैं। कभी उनकी आवाज, उनका साथ और छोटी-छोटी बातें बहुत सामान्य लगती थीं… लेकिन आज वही छोटी-छोटी बातें सबसे कीमती लगती हैं।
कभी-कभी मन करता है कि समय को थोड़ा पीछे ले जाऊं… फिर से वही पुराने दिन जी लूं, काश फिर से वही लोग मिल जाएं, फिर से वही बेफिक्री वाली बातें हों, और बिना किसी स्वार्थ के साथ बैठने का वह समय लौट आए।
लेकिन समय वापस नहीं आता।
इसलिए शायद जरूरी है कि जिंदगी को आगे बढ़ाते हुए रिश्तों को पीछे न छूटने दें।
सफलता जरूरी है, लेकिन सफलता का आनंद बांटने वाला कोई अपना न हो तो वह अधूरी लगती है।
पैसा जरूरी है, लेकिन उसे खर्च करके खुशी बांटने वाले लोग न हों तो उसका अर्थ कम हो जाता है।
मंजिल जरूरी है, लेकिन रास्ते में साथ चलने वाले अपने लोग न हों तो सफर सूना हो जाता है।
इसलिए आज अगर कोई अपना याद आ रहा है, तो उसे फोन कर लीजिए।
अगर किसी से मनमुटाव है, तो एक कदम आप बढ़ा दीजिए।
अगर दोस्त दूर हो गए हैं, तो हाल पूछ लीजिए।
हम जन्मदिन याद रखने के लिए सोशल मीडिया पर रिमाइंडर लगाते हैं, लेकिन मां की आंखों में तरसते छिपे प्यार को नहीं देख पाते।
हम दूर बैठे किसी व्यक्ति को तुरंत संदेश या फोन पर संपर्क साध लेते हैं, लेकिन पास बैठे पिता से दो मिनट बात करने का समय नहीं निकाल पाते।
तमाम बातों को छोड़कर माता-पिता के संबंध में एक बार गौर कीजिए-
मुझे पता है कि मेरी माता जी या पिताजी धीरे-धीरे चलते हैं परंतु फिर भी मैं जल्दी-जल्दी तेज चलकर उनसे आगे निकल जाता हूं. इसके उलट जब मैं छोटा था उन्होंने कभी मुझसे आगे निकलने की कोशिश नहीं की बल्कि मेरे छोटे-छोटे कदमों से कदम मिलाकर मेरा साथ दिया.
आज की नई तकनीको से भरी हुई जिंदगी में अपने माताजी- पिताजी को बोल देता हूं आपको कुछ नहीं आता. इसके उलट उन्होंने मुझे सिखाने में अपनी सारी जिंदगी का ज्ञान मेरे अंदर उडेल दिया.
मुझे पता है कि वाहन मोटरबाइक/कार तेज चलाने से उस पर सवार मेरे माता जी-पिताजी को डर महसूस होता है. फिर भी मैं गाड़ी तेज चलाता हूं. न जाने क्यों मेरा विवेक खत्म हो जाता है.
जब माता जी-पिताजी बीमार हो जाते हैं तो मैं उनकी चिकित्सा देखभाल औषधि ठीक प्रकार से नहीं कर पाता और कभी-कभी बहाने भी बना देता हूं. लेकिन उन्होंने कभी मेरी बीमारी देखभाल औषधि में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं छोड़ी. और मेरे लिए चिकित्सकों के सामने पता नहीं कितनी प्रार्थना की होगी.
अगर माता-पिता पास हैं, तो उनके साथ कुछ समय बैठ जाइए। उनके लिए यही सबसे बड़ी खुशी है.
क्योंकि जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है—
हम जिंदगी को बेहतर बनाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उसे खूबसूरत बनाने वाले रिश्तों को ही खो देते हैं।
जिंदगी बढ़ती रहे, सपने पूरे होते रहें, मंजिलें मिलती रहें…
बस इतना ध्यान रहे कि इस सफर में अपने लोग पीछे न छूट जाएं।
क्योंकि आखिर में शायद हमें यह याद रहे ना रहे कि हमने कितनी दौलत कमाई, कितनी मंजिलें हासिल कीं या कितने लोगों को पीछे छोड़ा…
हमें याद रहेंगे तो सिर्फ वे लम्हे ,
जिनको हमने दिल से अपनों के साथ बिताया था.
“मेरी भावनाएं”
-अमित्रघात








