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Reading: मुख्यमंत्री कैसा हो? जनता के सवालों से तय होगी नेतृत्व की असली कसौटी-Newsnetra
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News Netra > ताज़ा खबर > उत्तराखंड > मुख्यमंत्री कैसा हो? जनता के सवालों से तय होगी नेतृत्व की असली कसौटी-Newsnetra
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मुख्यमंत्री कैसा हो? जनता के सवालों से तय होगी नेतृत्व की असली कसौटी-Newsnetra

News Netra Admin
Last updated: 2026/09/01 at 9:56 PM
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मुख्यमंत्री कैसा हो? जनता के सवालों से तय होगी नेतृत्व की असली कसौटी-Newsnetra

लोकतंत्र का बड़ा सवाल—मुख्यमंत्री कैसा हो?

रवि मैंदोला
स्वतंत्र लेखक एवं सामाजिक चिंतक
1 सितंबर, 2026

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मुख्यमंत्री कैसा होना चाहिए?

यह सवाल किसी एक व्यक्ति, एक राज्य, एक सरकार या किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं है। यह लोकतंत्र में नेतृत्व की उस कसौटी का सवाल है, जिस पर हर राज्य के मुख्यमंत्री को खरा उतरना चाहिए।

जनता मुख्यमंत्री से यह अपेक्षा नहीं करती कि वह हर सड़क स्वयं बनवाए, हर अस्पताल में डॉक्टर बने या हर थाने में बैठकर शिकायतें सुने। इसके लिए पूरा प्रशासनिक ढांचा मौजूद है—पुलिस, जिला प्रशासन, स्वास्थ्य, शिक्षा, नगर निकाय, खाद्य सुरक्षा, आबकारी, खनन, राजस्व और आपदा प्रबंधन जैसे विभाग।

लेकिन सवाल यह है कि यदि इनमें से कोई विभाग अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहा, तो उसकी जवाबदेही आखिर कहां तय होगी?

यहीं नेतृत्व की भूमिका शुरू होती है।

मुख्यमंत्री हर जगह नहीं जा सकता, लेकिन उसके नेतृत्व में ऐसी व्यवस्था जरूर होनी चाहिए जहां कोई अधिकारी या कर्मचारी यह न समझे कि जनता के काम में लापरवाही के बाद भी उससे कभी सवाल नहीं पूछा जाएगा। ईमानदार अधिकारी को सम्मान और सहयोग मिलना चाहिए, लेकिन जो व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से जानबूझकर बचता है, उसे जवाब देना चाहिए।

हमने फिल्मों में भी कई बार व्यवस्था और जवाबदेही के सवाल देखे हैं। नायक जैसी फिल्म ने वर्षों पहले लोगों के मन में यह विचार पैदा किया था कि यदि सत्ता में बैठा व्यक्ति अचानक व्यवस्था की वास्तविक स्थिति जानने निकल पड़े तो क्या होगा। फिल्मों को वास्तविक शासन का मॉडल नहीं माना जा सकता, लेकिन वे समाज के सामने सवाल जरूर रखती हैं।

फिर सवाल यह है कि हम पर्दे पर जवाबदेही देखकर खुश तो होते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उसकी अपेक्षा क्यों नहीं करते?

क्या किसी मुख्यमंत्री को कभी बिना पहले से सूचना दिए किसी सरकारी कार्यालय, पुलिस थाने, अस्पताल, स्कूल या आम बस्ती में नहीं जाना चाहिए?

क्या कभी किसी पुलिस थाने में अचानक जाकर यह नहीं देखना चाहिए कि आम नागरिक की शिकायतों का क्या हुआ?

क्या किसी सरकारी अस्पताल में मरीज से सीधे नहीं पूछा जा सकता कि इलाज और दवा ठीक से मिल रही है या नहीं?

क्या किसी सरकारी स्कूल के बच्चे से यह नहीं पूछा जा सकता कि शिक्षक नियमित पढ़ाने आते हैं या नहीं?

क्या किसी गरीब बस्ती में जाकर यह नहीं जाना जा सकता कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में मिला या केवल कागजों में दर्ज हो गया?

क्योंकि सरकारी रिपोर्ट और जमीनी हकीकत हमेशा एक जैसी नहीं होती।

फाइलों में काम पूरा हो सकता है, लेकिन जमीन पर समस्या बनी रह सकती है। रिपोर्ट में अस्पताल की सुविधा उपलब्ध हो सकती है, लेकिन मरीज को डॉक्टर न मिल रहा हो। आंकड़ों में कानून-व्यवस्था बेहतर दिखाई दे सकती है, लेकिन कोई महिला रात में अकेले घर लौटने से डरती हो।

और यहीं से शासन की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा शुरू होती है—क्या जनता सुरक्षित है?

किसी भी राज्य की पहली जिम्मेदारी नागरिक की सुरक्षा है। सड़कें, उद्योग, निवेश और विकास योजनाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यदि नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करता तो विकास अधूरा रह जाता है।

क्या एक महिला सुनसान सड़क से अकेले घर लौटते समय सुरक्षित महसूस करती है?

क्या माता-पिता अपनी बेटी के देर से घर आने पर निश्चिंत रह सकते हैं?

जब महिलाओं के खिलाफ अपराध और बलात्कार जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो केवल घटना के बाद कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। यह भी पूछा जाना चाहिए कि अपराध होने से पहले उसे रोकने के लिए क्या व्यवस्था थी। पुलिस गश्त पर्याप्त थी या नहीं? संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान हुई या नहीं? शिकायतों को गंभीरता से लिया गया या नहीं?

कानून का उद्देश्य केवल अपराध होने के बाद अपराधी को पकड़ना नहीं है। कानून का उद्देश्य अपराधी के मन में अपराध करने से पहले भय पैदा करना भी है।

आज बड़ा सवाल यह है कि ईमानदार नागरिक डरता क्यों है और गलत काम करने वाला कई बार निश्चिंत क्यों दिखाई देता है?

लोकतंत्र में डर की दिशा सही होनी चाहिए।

जनता भयमुक्त हो और गलत काम करने वाला कानून से डरे।

नशा आज अनेक परिवारों की सबसे बड़ी चिंता है। माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ने के लिए बाहर भेजते हैं, लेकिन उन्हें डर रहता है कि कहीं बच्चा गलत संगत या नशे का शिकार न हो जाए।

आखिर नशा युवाओं तक पहुंच कैसे रहा है?
कौन बेच रहा है?
कहां से आ रहा है?
क्या स्थानीय प्रशासन और पुलिस को इसकी जानकारी नहीं होती?

यदि नहीं होती, तो चिंता की बात है। यदि होती है, तो कार्रवाई पर्याप्त क्यों नहीं है?

नशे के खिलाफ केवल अभियान और पोस्टर पर्याप्त नहीं हैं। जनता परिणाम देखना चाहती है—क्या नशा कम हुआ? क्या बेचने वालों पर कार्रवाई हुई? क्या युवाओं तक इसकी पहुंच रुकी?

इसी प्रकार धोखे, धमकी, ब्लैकमेल और जबरदस्ती के मामलों में भी कानून को सक्रिय होना चाहिए। हर वयस्क को अपनी पसंद से जीवन जीने और संबंध बनाने का अधिकार है, लेकिन किसी व्यक्ति को झूठ, पहचान छिपाकर, धमकी या दबाव के माध्यम से किसी निर्णय के लिए मजबूर करना अपराध है।

यदि किसी महिला या पुरुष के साथ धोखा, हिंसा या जबरदस्ती हो रही है, तो उसे समय पर सुरक्षा मिलनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति पर किसी धार्मिक या व्यक्तिगत निर्णय के लिए अवैध दबाव डाला जा रहा है, तो कानून को निष्पक्षता और तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए।

कानून का उद्देश्य किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को धोखे, हिंसा और जबरदस्ती से बचाना होना चाहिए।

व्यापारी की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति व्यापार करता है, रोजगार देता है और राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान करता है, क्या वह भयमुक्त है?

क्या किसी व्यापारी को रंगदारी या धमकी के फोन नहीं आते?

यदि आते हैं, तो शिकायत के बाद कार्रवाई कितनी तेजी से होती है?

निवेश से पहले राज्य में ऐसा माहौल जरूरी है जहां स्थानीय व्यापारी भी स्वयं को सुरक्षित महसूस करे।

गौवंश और पशु सुरक्षा भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। समाज के अनेक संगठन और लोग घायल या बेसहारा पशुओं की मदद करते हैं। यह सराहनीय है। लेकिन हर बार सामाजिक या धार्मिक संगठनों को ही आगे क्यों आना पड़े?

यदि सड़क पर बेसहारा गोवंश है, यदि कोई पशु घायल है या पशु क्रूरता हो रही है, तो पुलिस, पशुपालन विभाग और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी क्या है?

समाज की भूमिका अपनी जगह है, लेकिन कानून और प्रशासन की जिम्मेदारी अपनी जगह।

यदि कानून है तो उसका प्रभाव जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए।

प्राकृतिक आपदाओं के समय प्रशासन की असली परीक्षा होती है। बाढ़, भूस्खलन, चक्रवात और अत्यधिक बारिश के बाद राहत पहुंचाना जरूरी है, लेकिन अच्छा प्रशासन केवल आपदा के बाद सक्रिय नहीं होता। वह पहले से तैयार रहता है।

क्या संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की गई?
क्या राहत सामग्री उपलब्ध थी?
क्या अस्पताल और बचाव दल तैयार थे?
क्या लोगों तक समय पर चेतावनी पहुंची?
आपदा के समय जनता विभागों के नाम नहीं पूछती। उसे केवल समय पर मदद चाहिए।

बारिश भी हर वर्ष आती है। फिर भी बारिश शुरू होते ही कई शहरों में सड़कें जलमग्न क्यों हो जाती हैं? घर और दुकानें पानी में क्यों डूब जाती हैं? लोगों को कमर या कंधे तक पानी से क्यों गुजरना पड़ता है?

बरसात से पहले नालों की सफाई किसकी जिम्मेदारी है?

यदि बारिश का मौसम पहले से पता है तो तैयारी पहले क्यों नहीं होती?

भ्रष्टाचार और रिश्वत भी जनता की रोजमर्रा की परेशानी है। आज भी कई नागरिक मानते हैं कि सरकारी काम करवाने के लिए “कुछ देना” पड़ेगा।

लेकिन किसी व्यक्ति को अपने वैध अधिकार के लिए रिश्वत क्यों देनी चाहिए?

यदि किसी कार्यालय में लगातार रिश्वत की शिकायतें आती हैं, तो सवाल केवल कर्मचारी से नहीं होना चाहिए। उसके वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

सरकारी कार्यालयों में दलालों की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या आम नागरिक अपना काम सीधे नहीं करवा सकता? यदि व्यवस्था इतनी जटिल है कि दलाल की जरूरत पड़ती है, तो व्यवस्था को सरल बनाना किसकी जिम्मेदारी है?

त्योहारों के समय एक और सवाल जनता की सेहत से जुड़ा है।

त्योहारों पर मिलावट करने वाले को डर क्यों नहीं?

मिठाई खरीदने वाला परिवार क्यों सोचे कि खोया असली है या नकली? घी शुद्ध है या नहीं? पनीर सुरक्षित है या नहीं?

जनता क्यों डरे?

डर उस व्यक्ति को होना चाहिए जो लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रहा है।

यदि खाद्य सुरक्षा विभाग नियमित जांच करे, समय पर नमूने ले और दोषियों पर ऐसी कार्रवाई हो जिसका वास्तविक प्रभाव दिखाई दे, तो मिलावट करने वाला भी कानून से डरेगा।

बाजार और आबकारी से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी वस्तु का निर्धारित मूल्य है तो उससे अधिक कीमत क्यों ली जाती है? यदि शराब की बिक्री के नियम और मूल्य तय हैं, तो उनका पालन कौन सुनिश्चित करता है?

नियम बनाना पर्याप्त नहीं है। उनका पालन कराना भी जरूरी है।

शिक्षा के क्षेत्र में निजी स्कूलों की बढ़ती फीस, महंगी किताबें और अभिभावकों पर बढ़ता आर्थिक बोझ चिंता का विषय है। हर माता-पिता अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देना चाहता है, लेकिन हर वर्ष फीस बढ़े, किताबें बदलें और महंगी सामग्री खरीदने का दबाव बने तो नियामक व्यवस्था को भी जवाब देना चाहिए।

स्वास्थ्य व्यवस्था में भी जनता की चिंता सरल है—मरीज को डॉक्टर मिला या नहीं? समय पर इलाज हुआ या नहीं? जरूरी दवा उपलब्ध थी या नहीं?

किसी सरकारी अस्पताल की सबसे सच्ची रिपोर्ट उस मरीज के पास होती है जो वहां इलाज कराने पहुंचा है।

युवा और बेरोजगारी किसी भी राज्य के भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं। एक युवा वर्षों मेहनत करता है और नौकरी की तैयारी करता है। भर्ती में देरी, अनिश्चितता और पेपर लीक जैसी घटनाएं केवल परीक्षा नहीं बिगाड़तीं, वे युवाओं का समय और भविष्य प्रभावित करती हैं।

पेपर लीक होने के बाद केवल जांच की घोषणा पर्याप्त नहीं है। यह भी पूछा जाना चाहिए कि ऐसा हुआ कैसे, जिम्मेदार कौन था और भविष्य में इसे रोकने के लिए क्या बदलाव किया गया।

खनन, जमीन और पर्यावरण भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग आवश्यक हो सकता है, लेकिन अवैध खनन, पर्यावरण को नुकसान और नियमों का उल्लंघन गंभीर प्रश्न हैं।

यदि कहीं लंबे समय तक अवैध गतिविधियां चलती रहती हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—किसी को पता नहीं था या किसी ने जानना जरूरी नहीं समझा?

सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे, भू-माफिया और अवैध निर्माण प्रशासन की निष्पक्षता की परीक्षा हैं। कानून की असली ताकत तभी दिखाई देती है जब वह प्रभावशाली और कमजोर, दोनों के लिए समान हो।

सड़कें और सरकारी निर्माण भी जनता के पैसे से होते हैं। यदि सड़क बनने के कुछ समय बाद टूट जाती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। खराब गुणवत्ता का नुकसान अंततः जनता को ही उठाना पड़ता है।

लेकिन यह भी सच है कि हर अधिकारी और कर्मचारी गलत नहीं है। देश की व्यवस्था आज भी लाखों ईमानदार और जिम्मेदार लोगों के कारण चल रही है।

उनका सम्मान होना चाहिए।

लेकिन जहां कोई व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है, वहां सवाल होना चाहिए।

हर पुलिसकर्मी खुद से पूछे—क्या मैं पीड़ित की बात गंभीरता से सुनता हूं?

हर डॉक्टर पूछे—क्या मैं मरीज को सही सेवा दे रहा हूं?

हर शिक्षक पूछे—क्या मैं बच्चों के भविष्य के साथ न्याय कर रहा हूं?

हर अधिकारी पूछे—क्या मैं जनता का काम आसान कर रहा हूं या उसे चक्कर लगवा रहा हूं?

और यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर अपनी जिम्मेदारी से बच रहा है, तो उसे यह भरोसा नहीं होना चाहिए कि कोई उससे कभी सवाल नहीं पूछेगा।

यहीं मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

मुख्यमंत्री हर जगह स्वयं नहीं जा सकता, लेकिन वह ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था जरूर बना सकता है जिसमें जिम्मेदारी तय हो।

यदि किसी कर्मचारी की लापरवाही है तो अधिकारी जवाबदेह हो।

यदि अधिकारी लगातार लापरवाह है तो उसके वरिष्ठ से सवाल हो।

यदि किसी विभाग में वर्षों से समस्या बनी हुई है तो नेतृत्व तक उसकी जानकारी पहुंचे।

नेतृत्व का अर्थ हर काम स्वयं करना नहीं है।

नेतृत्व का अर्थ है—हर जिम्मेदार व्यक्ति को उसकी जिम्मेदारी का एहसास कराना।

क्या किसी मुख्यमंत्री को कभी बिना पहले से सूचना दिए किसी पुलिस थाने, अस्पताल, स्कूल, सरकारी कार्यालय या आम बस्ती में नहीं जाना चाहिए?

क्या उसे कभी किसी झुग्गी में जाकर नहीं पूछना चाहिए कि सरकारी सुविधा वास्तव में मिल रही है या नहीं?

क्या उसे कभी जनता से सीधे नहीं पूछना चाहिए—

“सच बताइए, सब ठीक है?”

जनता असंभव चीजें नहीं मांगती।

वह केवल इतना चाहती है कि महिला सुरक्षित हो, अपराधी कानून से डरे, युवा नशे से बचें, व्यापारी भयमुक्त हो, रिश्वत के बिना सरकारी काम हो, त्योहारों पर मिलावट करने वाला डरे, बच्चों की शिक्षा अभिभावकों पर असहनीय बोझ न बने, मरीज को समय पर इलाज मिले, युवाओं को निष्पक्ष अवसर मिले, आपदा में समय पर मदद पहुंचे, अवैध खनन और कब्जों पर कार्रवाई हो और हर सरकारी विभाग अपनी जिम्मेदारी निभाए।

और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—

क्या हर अधिकारी अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभा रहा है?

यदि इसका उत्तर “हां” है, तो इससे अच्छी बात कोई नहीं।

लेकिन यदि उत्तर “नहीं” है, तो सुधार की जरूरत है।

एक अच्छे मुख्यमंत्री का अर्थ यह नहीं कि उसके राज्य में कभी कोई समस्या होगी ही नहीं। समस्याएं हर राज्य में होती हैं।

लेकिन अच्छे नेतृत्व की पहचान यह है कि समस्या को छिपाया न जाए। उसे समय पर पहचाना जाए। जिम्मेदार व्यक्ति से जवाब मांगा जाए। ईमानदार अधिकारी को सम्मान मिले। गलत काम करने वाले को कानून का भय हो।

और जनता को यह भरोसा हो कि उसकी बात केवल सुनी नहीं जाएगी, उस पर कार्रवाई भी होगी।

शायद मुख्यमंत्री ऐसा ही होना चाहिए—

जो केवल अधिकारियों की रिपोर्ट न पढ़े, बल्कि कभी-कभी जनता की बात भी सुने।

जो केवल प्रशंसा न सुने, आलोचना भी सुन सके।

जो केवल अच्छे काम का श्रेय न ले, बल्कि खराब व्यवस्था की जिम्मेदारी भी तय करे।

जो ईमानदार अधिकारियों का सहयोगी हो, लेकिन लापरवाह व्यवस्था के लिए जवाबदेही का प्रतीक हो।

क्योंकि मुख्यमंत्री का पद केवल अधिकार का पद नहीं है।

वह सबसे बड़ी जिम्मेदारी का पद भी है।

और शायद एक अच्छे शासन की सबसे सरल पहचान यही है—

जनता चैन से सो सके, लेकिन अपनी जिम्मेदारी से भागने वाला तंत्र चैन से न सो सके।

यही सवाल है—

लोकतंत्र का बड़ा सवाल—मुख्यमंत्री कैसा हो?
यह सवाल किसी एक मुख्यमंत्री से नहीं है।
किसी एक राज्य से नहीं है।
किसी एक सरकार या राजनीतिक दल से नहीं है।

यह सवाल भारत के हर उस व्यक्ति से है जिसे जनता की सेवा की जिम्मेदारी मिली है।

सरकारें बदलती रहेंगी।
मुख्यमंत्री बदलते रहेंगे।
अधिकारी बदलते रहेंगे।
लेकिन जनता की अपेक्षा नहीं बदलेगी।
उसे चाहिए—सुरक्षित जीवन, ईमानदार प्रशासन और जिम्मेदार शासन।

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