उत्तराखंड में बप्पा के विसर्जन से पहले जान लें ये पौराणिक मान्यता, देवभूमि में गणेश जी को विसर्जित करने की क्यों नहीं रही परंपरा ? -Newsnetra
अगर उत्तराखंड में भी करने जा रहे हैं बप्पा का विसर्जन, तो जरा ठहरिए : एक बार ये भी जान लीजिए
: रिद्धिमा ज्योतिषाचार्यों के अनुसार उत्तराखंड में घर-घर में भगवान गणेश जी को पूजा जाता है। यहां तक कि दरवाजे के ऊपर भी गणेश जी की प्रतिमा को उकेरा जाता है। मांगलिक कार्य में गोबर या मिट्टी से बने भगवान गणेश के प्रतिकात्मक विसर्जन की परंपरा रही है। लेकिन जिस तरह से इन दिनों गणपति विसर्जन किया जा रहा है, वैसी परंपरा उत्तराखंड में नहीं रही है।
ऐसी मान्यता है कि विसर्जन की परंपरा उन जगहों के लिए है जहां गणेश जी मेहमान या अतिथि के रूप में विराजमान किए जाते हैं। लेकिन उत्तराखंड को गणेशजी की जन्मस्थली माना जाता है। इसलिए लोगों का यह मत है कि यहां विसर्जन नहीं होना चाहिए।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश का जन्म उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में हुआ था। समुद्रतल से 3,310 मीटर की ऊंचाई पर खूबसूरत पहाड़ों से घिरा मनमोहक डोडीताल है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसान इस ताल के पास स्थित मंदिर को भगवान गश की जन्मस्थली माना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश का जन्म उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में हुआ था। समुद्रतल से 3,310 मीटर की ऊंचाई पर खूबसूरत पहाड़ों से घिरा मनमोहक डोडीताल है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसान इस ताल के पास स्थित मंदिर को भगवान गश की जन्मस्थली माना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार डोडीताल में ही माता पार्वती ने स्नान करने से पहले द्वार की सुरक्षा के लिए अपने उबटन से भगवान गणेश को उत्पन्न किया था। यहां गणपति और उनकी माता पार्वती की मूर्ति विराजमान है। डोडीताल के पास बने मंदिर में मां माता की पूजा माता अन्नपूर्णा के रूप में होती हैं।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में गणेश जी की एक विशिष्ट लोकपरंपरा रही है। घरों में गणेश जी को स्थायी रूप से प्रतिष्ठित कर पूजा जाता था। स्थानीय बोली में खिड़की को ‘खोली’ कहा जाता है और परंपरागत घरों में खोली के ऊपर गणेश जी की स्थापना किए जाने की मान्यता रही है। इसका भाव यही है कि भगवान गणेश घर के स्थायी मंगलकर्ता और रक्षक देवता के रूप में सदैव विराजमान रहें।
इसी दृष्टि से हमारे पर्वतीय समाज में गणेश जी का विसर्जन करने की परंपरा पारंपरिक रूप से प्रचलित नहीं रही। जब किसी देवता को स्थायी रूप से अपने घर और क्षेत्र का देवता माना जाता है, तो उसे विसर्जित करने की अपेक्षा उसकी निरंतर पूजा और सेवा की भावना अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।
: Ridhima Rakha
B.B.A. ( Business Developer/ A.I. Tech Expert )








