आयुर्वेद में प्रकृति पूजा और संरक्षण की परंपरा, आज के दौर में बन सकती है पर्यावरण संरक्षण की राह-Newsnetra
वैद्य रामचंद्र उनियाल
उत्तरकाशी
प्रकृति पूजा एवं संरक्षण निहित है आयुर्वेद में l
आयुर्वेद में प्रकृति पूजा एवं संरक्षण का जो महत्व दर्शाया गया है वह आज के युग में एक पथ प्रदर्शक साबित होगा यही नहीं प्रकृति पूजा के अनुरूप वैद्य एवं चिकित्सक को कार्य करने की हिदायत आयुर्वेदिक ग्रंथ में देखने को मिलती है, किसी भी ग्रंथ के प्रथम चरण में हमें पहले पँ च तत्वों का ज्ञान करना उनके ही अनुरूप चिकित्सा करना हमारे आयुर्वेद का मुख्य अंग रहा है, पंच भौतिक तत्वों का संयोजन ही जहां शरीर से संबंधित है वही प्रकृति के उन पौधों से भी संबंधित है जिन्हें हम उखाड़ कर अपनी चिकित्सा में प्रयोग करते हैंl क्योंकि पौधे की संरचना मनुष्य की भांति ही होती है क्योंकि औषधि एवं में भी पांच तत्व की प्रधानता होने से रोग मुक्ति में उनका सहयोग एक विचारणीय विषय है l इसीलिए कहा है कि जीवन पौधों में भी पाया जाता है, यही नहीं आयुर्वेद संरक्षण के साथ ही प्रकृति पूजा का प्रथम प्रदर्शन के रूप में जाना जाता है इसीलिए आयुर्वेद को शरीर की संरचना के अनुरूप उसकी प्रकृति उसका त्रिदोष निर्धारित कर हम औषधीय का चयन करके हम रोगों से शरीर की रक्षा करते हैं, मनुष्य की प्रकृति दोष के अनुरूप ही हम वन औषधीय का चयन कर रोग रहित शरीर की कल्पना कर सकते हैं l रस वीर्य गुण कर्म के अनुसार ही हम औषधि का चयन कर रोगान्मूलन नहीं सक्षम हो सकते हैं,
आयुर्वेद में वनोषधियों की पूजा पद्धति l
पुनर्वसु आत्रेय की दृष्टि से यह संसार बिना वन औषधियां के नहीं है, संसार में उगने वाला पेट पौधा औषधि गुना से परिपूर्ण है इसलिए यह कहा जाना अनुचित होगा कि कोई भी पौधा वृक्ष लता अपने अंदर औषधि गुना से संपन्न है हम उसकी पहचान कैसे करते हैं या हमारे ऊपर निश्चित है यही ज्ञान परंपरा आयुर्वेद की मूल धारणा रही है, भले ही आयुर्वेद मे रस शास्त्र का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान है फिर भी वन औषधि प्रभाव के कारण शास्त्र मे भी समस्त जड़ पदार्थों को इन औषधीय से परिमार्जित करने का विधान है l
आयुर्वेद में किसी भी जड़ी बूटी को उखाड़ने से पूर्व उसकी पूजा करना उसको आमंत्रित करना उसको आवाहित करना एक परंपरा रही है, साथ में यह भी कहीं-कहीं देखने को मिलता है कि एक पौधे के स्थान पर दूसरा इस स्वरूप का इस गुणधर्म का पौधा रोपित करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि प्रकृति संरक्षण एवं पौधे के उपलब्धता बनी रहे
आध्यात्मिक की कसौटी पर यह ज्ञान प्रकृति के संरक्षण में सहायक सिद्ध होगा, साथ ही हमें औषधीय के अभाव से नहीं जूझना पड़ेगा जो आज के युग में प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है, वैज्ञानिकों के मत अनुसार यदि एक पौधा नष्ट होता है तो उसके आसपास होने वाले 30 प्रजाति के पौधों का विलुप्त होने , के संकेत मिलते हैं,जिसके कारण प्रकृति का असंतुलित होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, विश्व में होने वाले ग्लोवींग वर्म तथा प्रकृति का असंतुलित होना भी एक कारण हो सकता हैl औषधीय को आव्हाहित कर उनकी पूजा करना, उसे पौधे का उपयोग करना तथा इस पौधे को स्थापित कर प्रकृति संरक्षण का एक स्रोत बन सकता है l







