लोकगीतों की सामाजिक उपयोगिता एवं उत्तरदायित्व: संस्कृति, चेतना और सामाजिक मूल्यों के संवाहक-Newsnetra
— रजनीकांत सेमवाल
प्रसिद्ध लोक गायक, उत्तराखंड
लोकगीत किसी भी समाज की आत्मा होते हैं। वे केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के इतिहास, संस्कृति, परंपराओं, नैतिक मूल्यों और लोकजीवन के अनुभवों का जीवंत दस्तावेज होते हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा से चले आ रहे लोकगीत समाज की सामूहिक स्मृति को संरक्षित रखते हैं और सामाजिक चेतना का सशक्त माध्यम बनते हैं।
उत्तराखंड के लोकगीतों में प्रकृति, पर्व-त्योहार, खेती-बाड़ी, लोकदेवताओं, नदियों, पहाड़ों, मातृभूमि, पारिवारिक रिश्तों तथा जीवन के प्रत्येक संस्कार का सुंदर चित्रण मिलता है। मांगल गीत, झोड़ा, छपेली, चांचरी, जागर और ऋतु-गीत केवल संगीत नहीं हैं, बल्कि वे हमारी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता के प्रतीक हैं। इनके माध्यम से समाज में प्रेम, सहयोग, भाईचारा और मानवीय संवेदनाओं का विकास होता है।

लोकगीतों का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व समाज को सही दिशा देना है। यदि लोकगीतों में सकारात्मक संदेश, पर्यावरण संरक्षण, महिला सम्मान, नशामुक्ति, शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक समरसता जैसे विषय शामिल हों, तो वे जनजागरण का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। लोककला की यही शक्ति उसे अन्य कलाओं से अलग पहचान देती है। लोकगीत समाज का दर्पण भी हैं और उसका मार्गदर्शक भी।
आज डिजिटल युग में लोकगीतों की लोकप्रियता पहले से अधिक बढ़ी है। सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने लोक कलाकारों को नई पहचान दी है। लेकिन इसके साथ यह जिम्मेदारी भी बढ़ गई है कि प्रस्तुति के नाम पर लोकगीतों की मूल आत्मा, भाषा और गरिमा से समझौता न किया जाए। अश्लीलता, भद्दे शब्दों और केवल व्यावसायिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत गीत लोकसंस्कृति को कमजोर करते हैं।
एक लोक कलाकार का दायित्व केवल गीत गाना नहीं, बल्कि समाज को संस्कारित करना भी है। जब कलाकार अपने गीतों में अपनी मातृभाषा, लोकभाषा, लोकपरंपराओं और सामाजिक मूल्यों को स्थान देता है, तब वह आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण करता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विद्यालयों, महाविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और सामाजिक मंचों पर लोकगीतों को सम्मानपूर्वक स्थान मिले। नई पीढ़ी को अपनी लोकधरोहर से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि हम अपने लोकगीतों को बचाए रखेंगे, तो हमारी संस्कृति, हमारी भाषा और हमारी सामाजिक पहचान भी सुरक्षित रहेगी।
लोकगीत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की सांस्कृतिक पूंजी हैं। इसलिए हम सभी का कर्तव्य है कि लोकगीतों को केवल सुनें ही नहीं, बल्कि उनके संदेश को अपने जीवन में उतारें और आने वाली पीढ़ियों तक उसी आत्मीयता और गरिमा के साथ पहुँचाएँ। यही लोकगीतों की वास्तविक सामाजिक उपयोगिता और सबसे बड़ा उत्तरदायित्व है।





